ब्रिटेन में शरणार्थियों की उम्र की AI जांच : तकनीक के जोखिम और नैतिक सवाल
द्वारा Mag-Info Tech editorial · 2026-06-21

ब्रिटेन सरकार अगले साल से शरणार्थियों की उम्र का पता लगाने के लिए चेहरे की AI जांच को लागू करने जा रही है। इस तकनीक को फेशियल एज एस्टिमेशन (FAE) कहा जाता है, जिसमें कैमरे से चेहरा स्कैन कर AI अनुमान लगाता है कि व्यक्ति कितने साल का है। सरकार का कहना है कि कई शरणार्थियों के पास उम्र साबित करने वाले दस्तावेज नहीं होते, इसलिए इस तकनीक से उनकी असली उम्र का पता लगाया जाएगा। मगर विशेषज्ञों और अधिकारियों की चिंता है कि यह तकनीक बच्चों को वयस्क दिखा सकती है, जिससे उन्हें गलत श्रेणी में रखा जा सकता है। अगर किसी बच्चे को वयस्क मान लिया जाता है, तो उसे वयस्कों वाले हिरासत केंद्रों में भेजा जा सकता है, जहां कानूनी सुरक्षा और देखभाल की कमी होती है। यह सिर्फ तकनीकी खामी नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का गंभीर मसला बन सकता है।
AI आधारित उम्र जांच कैसे काम करती है और क्यों है विवादित
फेशियल एज एस्टिमेशन तकनीक चेहरे की विशेषताओं—जैसे आंखों, नाक और मुंह के अनुपात—का विश्लेषण कर उम्र का अनुमान लगाती है। यह तकनीक आमतौर पर चेहरे की पहचान प्रणालियों के साथ ही काम करती है, जो पहले से ही हवाई अड्डों, सीमा चौकियों और पुलिस जांच में इस्तेमाल हो रही हैं। मगर उम्र का अनुमान लगाने में AI की सटीकता सीमित होती है, खासकर बच्चों और किशोरों के मामले में, क्योंकि उनके चेहरे तेजी से बदलते हैं। सरकार के आंतरिक दस्तावेजों से पता चला है कि AI प्रणाली ने परीक्षणों के दौरान कई बार बच्चों को वयस्क दिखाया, जबकि कुछ मामलों में वयस्कों को बच्चे बताया गया। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि AI मॉडल को प्रशिक्षित करने वाले डेटा में विविधता नहीं होती—अधिकतर प्रशिक्षण डेटा यूरोपीय या अमेरिकी चेहरे होते हैं, जिससे अन्य नस्लों या उम्र समूहों के चेहरे गलत तरीके से पहचाने जा सकते हैं। इस तरह की गलतियां न सिर्फ तकनीकी खामी हैं, बल्कि संस्थागत भेदभाव का भी कारण बन सकती हैं।
इस तकनीक के इस्तेमाल से पहले ही कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि AI आधारित उम्र जांच विश्वसनीय नहीं है। 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि चेहरे की उम्र जांच प्रणालियां 18 साल से कम उम्र के लोगों को 30 प्रतिशत तक गलत तरीके से वयस्क दिखा सकती हैं। यह समस्या उन शरणार्थी बच्चों के लिए और गंभीर हो जाती है, जो युद्ध, उत्पीड़न या लंबी यात्रा के कारण मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर होते हैं। अगर उनकी उम्र गलत तरीके से तय कर दी जाती है, तो उन्हें कानूनी सुरक्षा नहीं मिल पाती, जिससे वे बाल संरक्षण कानूनों से वंचित रह जाते हैं। यह तकनीक न सिर्फ उनकी सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है, बल्कि उनके मानवाधिकारों का भी उल्लंघन कर सकती है।
सरकार के दावे और तकनीक के वास्तविक प्रदर्शन में अंतर
ब्रिटेन सरकार का कहना है कि चेहरे की AI जांच से शरणार्थियों की उम्र का पता लगाने में मदद मिलेगी, खासकर उन मामलों में जहां दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते। सरकार का दावा है कि यह तकनीक पारंपरिक तरीकों—जैसे हड्डियों के एक्स-रे या सामाजिक कार्यकर्ताओं के निरीक्षण—की तुलना में अधिक वस्तुनिष्ठ और तेज है। मगर सरकार के ही आंतरिक दस्तावेज बताते हैं कि तकनीक की सटीकता बहुत कम है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि AI प्रणाली ने 16 साल के बच्चों को 18 साल से ऊपर का बताया, जबकि 25 साल के वयस्कों को 17 साल का दिखाया। ऐसे मामलों में गलत निर्णय लेने से शरणार्थियों के जीवन पर गंभीर असर पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी 17 साल के बच्चे को वयस्क मान लिया जाता है, तो उसे बाल आश्रय केंद्रों के बजाय वयस्क हिरासत केंद्र में भेजा जा सकता है, जहां उसे बाल संरक्षण कानूनों के तहत मिलने वाली सुरक्षा नहीं मिलेगी।

इसके अलावा, सरकार ने यह भी स्वीकार किया है कि तकनीक के इस्तेमाल से पूर्वाग्रह की संभावना है। AI मॉडल को प्रशिक्षित करने वाले डेटा में अगर किसी विशेष जातीय समूह या उम्र समूह की कमी है, तो वह समूह गलत तरीके से पहचाना जा सकता है। उदाहरण के लिए, अफ्रीकी मूल के बच्चों को अक्सर यूरोपीय बच्चों की तुलना में छोटा बताया जाता है, जबकि दक्षिण एशियाई मूल के लोगों को उनकी वास्तविक उम्र से बड़ा दिखाया जा सकता है। इस तरह के पूर्वाग्रह से शरणार्थियों के प्रति भेदभाव बढ़ सकता है और उन्हें न्याय नहीं मिल पाएगा। सरकार का यह तर्क कि तकनीक वस्तुनिष्ठ है, वास्तविकता से बहुत दूर है, क्योंकि AI प्रणालियां उतनी ही निष्पक्ष होती हैं जितना उनके प्रशिक्षण डेटा होते हैं।
कानूनी और नैतिक मुद्दे : क्या AI आधारित निर्णय न्यायसंगत हैं?
चेहरे की AI जांच का इस्तेमाल शरणार्थियों की उम्र तय करने के लिए कानूनी और नैतिक दोनों स्तरों पर सवाल खड़े करता है। सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि AI द्वारा लिया गया निर्णय मनुष्य द्वारा लिया गया निर्णय जैसा ही माना जाएगा, जबकि तकनीक की विश्वसनीयता संदिग्ध है। अगर कोई अधिकारी AI के सुझाव को बिना किसी मानवीय समीक्षा के स्वीकार कर लेता है, तो गलत निर्णय लेने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल करते समय मनुष्य की भूमिका अनिवार्य होनी चाहिए, ताकि गलतियों को सुधारा जा सके। मगर सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि AI के सुझावों की समीक्षा कौन करेगा और किस आधार पर गलत निर्णयों को चुनौती दी जा सकेगी।
नैतिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो AI आधारित उम्र जांच शरणार्थियों के प्रति सरकार की नीतियों में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को उजागर करती है। शरणार्थियों के अधिकार अंतरराष्ट्रीय कानूनों द्वारा संरक्षित हैं, और उन्हें उम्र के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटने का अधिकार केवल मनुष्यों को है, AI को नहीं। अगर AI प्रणाली किसी बच्चे को वयस्क मान लेती है, तो उसे बाल संरक्षण कानूनों से वंचित कर दिया जाता है, जो उसके अधिकारों का उल्लंघन है। इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल करते समय सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में मानवीय तत्व शामिल हो और तकनीक का इस्तेमाल केवल सहायक उपकरण के रूप में किया जाए, न कि निर्णय लेने वाले मुख्य साधन के रूप में।
तकनीक के जोखिम : जीवन पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभाव
AI आधारित उम्र जांच के गलत परिणामों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव बहुत गंभीर हो सकते हैं। अगर किसी बच्चे को गलती से वयस्क मान लिया जाता है, तो उसे वयस्क हिरासत केंद्र में भेजा जा सकता है, जहां उसे बाल संरक्षण कानूनों के तहत मिलने वाली सुरक्षा नहीं मिलेगी। ऐसे केंद्रों में हिंसा, शोषण और मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न का खतरा बहुत अधिक होता है। इसके अलावा, अगर किसी शरणार्थी को उसकी वास्तविक उम्र से छोटा बताया जाता है, तो उसे बाल आश्रय केंद्र में भेजा जा सकता है, जहां उसकी देखभाल और शिक्षा सुनिश्चित की जा सके। मगर अगर AI प्रणाली बार-बार गलत अनुमान लगाती है, तो शरणार्थियों को उचित देखभाल नहीं मिल पाएगी, जिससे उनके विकास और पुनर्वास पर नकारात्मक असर पड़ेगा।








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इसके अलावा, AI आधारित उम्र जांच के इस्तेमाल से शरणार्थियों के प्रति सरकार की नीतियों में पारदर्शिता की कमी भी सामने आती है। अगर शरणार्थी यह नहीं जानते कि उनकी उम्र का अनुमान कैसे लगाया गया, तो वे इस निर्णय को चुनौती देने में असमर्थ हो सकते हैं। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शरणार्थियों को उनके अधिकारों के बारे में पूरी जानकारी दी जाए और उन्हें अपने मामले की समीक्षा का अधिकार दिया जाए। अगर ऐसा नहीं किया जाता है, तो AI आधारित उम्र जांच मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बन सकती है।
दुनिया भर में AI आधारित उम्र जांच का इस्तेमाल : एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य
ब्रिटेन पहला देश नहीं है जो AI आधारित उम्र जांच का इस्तेमाल कर रहा है। दुनिया भर में कई देशों ने सोशल मीडिया प्लेटफार्मों, ऑनलाइन गेमिंग साइटों और वयस्क कंटेंट वेबसाइटों पर उम्र सत्यापन के लिए चेहरे की पहचान तकनीक का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को उपयोगकर्ताओं की उम्र सत्यापित करने के लिए चेहरे की पहचान तकनीक का इस्तेमाल करना अनिवार्य कर दिया गया है, जबकि अमेरिका के कई राज्यों में वयस्क कंटेंट वेबसाइटों को उपयोगकर्ताओं की उम्र सत्यापित करने के लिए इसी तकनीक का इस्तेमाल करना पड़ता है। मगर इन सभी मामलों में तकनीक की विश्वसनीयता और गोपनीयता संबंधी चिंताएं उठाई जाती रही हैं।
यूरोपीय संघ में AI आधारित उम्र जांच के इस्तेमाल को लेकर सख्त नियम हैं, और AI प्रणालियों को उच्च स्तर की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होती है। मगर ब्रिटेन में इस तकनीक का इस्तेमाल शरणार्थियों की उम्र जांचने के लिए किया जा रहा है, जो मानवाधिकारों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े करता है। अगर AI आधारित उम्र जांच को लेकर दुनिया भर में नियमों को सख्त नहीं किया जाता है, तो यह तकनीक भविष्य में और भी अधिक विवादों का कारण बन सकती है।
भविष्य की चुनौतियां : तकनीक को सुरक्षित और न्यायसंगत बनाने के लिए क्या किया जा सकता है?
AI आधारित उम्र जांच तकनीक को सुरक्षित और न्यायसंगत बनाने के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं। सबसे पहले, सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि AI प्रणालियों को प्रशिक्षित करने वाले डेटा में विविधता हो, ताकि सभी जातीय समूहों और उम्र समूहों के चेहरे सही तरीके से पहचाने जा सकें। इसके अलावा, तकनीक की सटीकता और विश्वसनीयता की स्वतंत्र रूप से समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि यह वास्तव में कितनी सटीक है।

दूसरे, AI के सुझावों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में केवल सहायक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, न कि मुख्य साधन के रूप में। मनुष्यों को हमेशा अंतिम निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए, ताकि गलतियों को सुधारा जा सके। इसके अलावा, शरणार्थियों को उनके अधिकारों के बारे में पूरी जानकारी दी जानी चाहिए और उन्हें अपने मामले की समीक्षा का अधिकार दिया जाना चाहिए।
अंत में, सरकारों को AI आधारित उम्र जांच के इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता बरतनी चाहिए। तकनीक के इस्तेमाल के पीछे के कारणों, इसके लाभों और जोखिमों के बारे में जनता को पूरी जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि वे इस तकनीक के इस्तेमाल को लेकर अपनी राय बना सकें। अगर सरकारें इन कदमों को उठाती हैं, तो AI आधारित उम्र जांच तकनीक को अधिक सुरक्षित और न्यायसंगत बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष : तकनीक के जोखिमों को समझना और जवाबदेही तय करना
ब्रिटेन सरकार द्वारा शरणार्थियों की उम्र का पता लगाने के लिए AI आधारित चेहरे की जांच तकनीक का इस्तेमाल एक बड़ा कदम है, मगर इसके जोखिम बहुत गंभीर हैं। तकनीक की विश्वसनीयता सीमित है, और इसके गलत परिणामों से शरणार्थियों के जीवन पर गंभीर असर पड़ सकता है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि तकनीक का इस्तेमाल केवल सहायक उपकरण के रूप में किया जाए, न कि निर्णय लेने वाले मुख्य साधन के रूप में। इसके अलावा, तकनीक को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि शरणार्थियों के अधिकारों की रक्षा की जा सके।
AI तकनीक का इस्तेमाल मानवाधिकारों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का परीक्षण करेगा। अगर सरकारें इस तकनीक का इस्तेमाल करते समय सावधानी नहीं बरतती हैं, तो यह तकनीक भविष्य में और भी अधिक विवादों का कारण बन सकती है। इसलिए, तकनीक के जोखिमों को समझना और जवाबदेही तय करना बेहद जरूरी है, ताकि AI आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया में मानवीय मूल्यों और अधिकारों की रक्षा की जा सके।
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