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स्टेबलकॉइन का असली बाजार कहाँ है? संस्थापकों का नक्शा और इस्तेमाल का नक्शा अलग क्यों?

द्वारा Mag-Info Tech editorial · 2026-06-28

स्टेबलकॉइन का असली बाजार कहाँ है? संस्थापकों का नक्शा और इस्तेमाल का नक्शा अलग क्यों?

स्टेबलकॉइन के वैश्विक बाजार में पिछले साल अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. 2025 में इनका कुल लेन-देन वॉल्यूम $28 ट्रिलियन तक पहुंच गया, जोकि वीजा और मास्टरकार्ड के मिलाकर कुल लेन-देन से भी ज्यादा है. लेकिन इस वृद्धि का फायदा उठाने वाले ज्यादातर स्टार्टअप और निवेश अमेरिका तथा यूरोप के शहरों तक ही सीमित रहे हैं. जबकि असली मांग तो अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे उभरते बाजारों में है. यहां स्टेबलकॉइन लोगों की रोजमर्रा की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने का जरिया बन गया है. इसी असंतुलन पर यह लेख केंद्रित है कि क्यों संस्थापकों का मानचित्र और इस्तेमाल का मानचित्र अलग-अलग दिखता है और इसका निवेशकों तथा उद्यमियों के लिए क्या मतलब है.

स्टेबलकॉइन वॉल्यूम का असली केंद्र: अफ्रीका और लैटिन अमेरिका

स्टेबलकॉइन के कुल लेन-देन वॉल्यूम का बड़ा हिस्सा अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से आता है. नाइजीरिया में ही 26 मिलियन से ज्यादा क्रिप्टो उपयोगकर्ता हैं, जिनमें से 59% लोग USDT (टेदर) का इस्तेमाल करते हैं. यह संख्या देश की कुल आबादी के लगभग आठवें हिस्से के बराबर है. इसी तरह अर्जेंटीना में स्टेबलकॉइन खरीदारी सभी एक्सचेंज ट्रेडों के आधे से ज्यादा का हिस्सा बन चुकी है. यहां मुद्रास्फीति इतनी ज्यादा है कि लोग अपनी बचत को स्थिर रखने के लिए स्टेबलकॉइन का सहारा ले रहे हैं.

लैटिन अमेरिका के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में स्टेबलकॉइन प्रवाह क्षेत्रीय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 7.7% तक पहुंच गया है. इसका मतलब है कि यहां की अर्थव्यवस्था में स्टेबलकॉइन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो चुकी है. जबकि अमेरिका और यूरोप में स्टेबलकॉइन मुख्य रूप से संस्थागत उपयोग तक सीमित रहे हैं, जहां बड़े बैंक और वित्तीय संस्थान अपने लेन-देन के लिए इनका इस्तेमाल कर रहे हैं.

अमेरिका-यूरोप में निवेश केंद्रित क्यों है?

स्टेबलकॉइन के विकास में निवेश का बड़ा हिस्सा अमेरिका और यूरोप के शहरों जैसे न्यूयॉर्क, सैन फ्रांसिस्को और लंदन में केंद्रित है. यहां निवेशकों को लगता है कि स्टेबलकॉइन का बाजार मुख्य रूप से संस्थागत और विनियमित क्षेत्र में ही विकसित होगा. बड़े वित्तीय संस्थानों जैसे ब्लैक rock, जेपी मॉर्गन और फिडेलिटी पहले से ही टोकनाइज्ड मनी मार्केट और उद्यम निपटान के क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं.

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लेकिन यह दृष्टिकोण उभरते बाजारों की वास्तविक मांग को नजरअंदाज कर देता है. यहां स्टेबलकॉइन लोगों के लिए एक वित्तीय साधन बन गया है, जो उन्हें मुद्रास्फीति, राजनीतिक अस्थिरता और बैंकिंग सेवाओं की कमी जैसी समस्याओं से निपटने में मदद करता है. जबकि अमेरिका और यूरोप में स्टेबलकॉइन का इस्तेमाल मुख्य रूप से बड़े लेन-देन और विनियमित वातावरण तक सीमित रहता है.

उभरते बाजारों में स्टेबलकॉइन का महत्व

उभरते बाजारों में स्टेबलकॉइन लोगों के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है. उदाहरण के लिए, वेनेजुएला और अर्जेंटीना जैसे देशों में मुद्रास्फीति इतनी ज्यादा है कि लोग अपनी बचत को स्थिर रखने के लिए स्टेबलकॉइन का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसी तरह नाइजीरिया जैसे देशों में जहां पारंपरिक बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच सीमित है, स्टेबलकॉइन लोगों को अंतरराष्ट्रीय लेन-देन और बचत करने का एक तरीका प्रदान करता है.

स्टेबलकॉइन का इस्तेमाल सिर्फ लेन-देन तक ही सीमित नहीं है. यह लोगों को क्रेडिट तक पहुंच प्रदान करने, छोटे व्यवसायों को वित्तपोषण करने और यहां तक कि रेमिटेंस (प्रेषण) के क्षेत्र में भी मदद कर रहा है. उदाहरण के लिए, अफ्रीका में बहुत से लोग जिन्होंने विदेश में नौकरी कर रहे हैं, वे अपने परिवारों को पैसे भेजने के लिए स्टेबलकॉइन का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह प्रक्रिया पारंपरिक तरीकों की तुलना में काफी सस्ती और तेज है.

निवेशकों के लिए अवसर और चुनौतियां

उभरते बाजारों में स्टेबलकॉइन की बढ़ती मांग निवेशकों के लिए एक बड़ा अवसर प्रस्तुत करती है. लेकिन इसके साथ ही कई चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं. सबसे बड़ी चुनौती है इन बाजारों में विनियमन और कानूनी ढांचे की कमी. कई देशों में स्टेबलकॉइन के इस्तेमाल पर अभी तक स्पष्ट नियम नहीं बने हैं, जिससे निवेशकों को जोखिम का सामना करना पड़ सकता है.

इसके अलावा, तकनीकी बुनियादी ढांचे की कमी भी एक बड़ी चुनौती है. कई उभरते बाजारों में इंटरनेट की पहुंच और तकनीकी साक्षरता अभी भी सीमित है, जिससे स्टेबलकॉइन का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या प्रभावित होती है. हालांकि, मोबाइल फोन की बढ़ती पहुंच और डिजिटल वित्तीय सेवाओं के विकास के साथ यह स्थिति बदल रही है.

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निवेशकों को इन चुनौतियों के बावजूद उभरते बाजारों में स्टेबलकॉइन स्टार्टअप्स में निवेश करने का एक बड़ा अवसर दिखाई दे रहा है. कई स्टार्टअप पहले से ही इन क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जो लोगों को स्टेबलकॉइन सेवाएं प्रदान कर रहे हैं. उदाहरण के लिए, अफ्रीका में कई फिनटेक कंपनियां मोबाइल वॉलेट और पेमेंट गेटवे के माध्यम से स्टेबलकॉइन सेवाएं प्रदान कर रही हैं.

स्टेबलकॉइन स्टार्टअप्स का वैश्विक परिदृश्य

स्टेबलकॉइन स्टार्टअप्स के वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो पाया जाता है कि ज्यादातर स्टार्टअप और निवेश अमेरिका तथा यूरोप में केंद्रित हैं. स्टेबलस्केप नामक एक प्लेटफॉर्म जो 3,000 से ज्यादा स्टेबलकॉइन और क्रिप्टो-फिनटेक कंपनियों पर नजर रखता है, के अनुसार कुल 1,300 से ज्यादा कंपनियां अमेरिका और यूरोप में स्थित हैं. जबकि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया में स्थित कंपनियों की संख्या काफी कम है.

इस असंतुलन का एक बड़ा कारण है निवेशकों की मानसिकता. ज्यादातर निवेशक अमेरिका और यूरोप के बाजारों को ज्यादा सुरक्षित और विनियमित मानते हैं, जबकि उभरते बाजारों को जोखिम भरा समझते हैं. हालांकि, उभरते बाजारों में स्टेबलकॉइन की मांग और विकास की दर काफी ज्यादा है, जिससे निवेशकों को इन क्षेत्रों में निवेश करने से काफी फायदा हो सकता है.

विनियमन और नीति निर्माताओं की भूमिका

विनियमन और नीति निर्माताओं की भूमिका भी इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है. अमेरिका और यूरोप में स्टेबलकॉइन के लिए स्पष्ट नियम बन चुके हैं, जबकि उभरते बाजारों में अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है. नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे इन बाजारों में स्टेबलकॉइन के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए स्पष्ट और अनुकूल नियम बनाएं.

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इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय संगठनों जैसे आईएमएफ और विश्व बैंक को भी इन बाजारों में स्टेबलकॉइन के विकास को समर्थन देना चाहिए. वे तकनीकी सहायता और वित्तीय संसाधनों के माध्यम से इन बाजारों में स्टेबलकॉइन स्टार्टअप्स को बढ़ावा दे सकते हैं.

भविष्य की राह: निवेशकों और स्टार्टअप्स के लिए क्या करें?

उभरते बाजारों में स्टेबलकॉइन की मांग और विकास को देखते हुए निवेशकों और स्टार्टअप्स को अपनी रणनीति में बदलाव लाने की जरूरत है. निवेशकों को चाहिए कि वे अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया जैसे उभरते बाजारों में निवेश करने पर ज्यादा ध्यान दें. इसके लिए उन्हें स्थानीय बाजारों, विनियमन और सांस्कृतिक कारकों को समझने की जरूरत है.

स्टार्टअप्स को भी चाहिए कि वे इन बाजारों की जरूरतों को समझें और उनके हिसाब से अपने उत्पाद विकसित करें. उदाहरण के लिए, मोबाइल फोन पर चलने वाले ऐप्स और कम डेटा खपत वाले प्लेटफॉर्म इन बाजारों में ज्यादा लोकप्रिय हो सकते हैं. इसके अलावा, स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक अनुकूलन पर भी ध्यान देना चाहिए.

निष्कर्ष के तौर पर, स्टेबलकॉइन का वैश्विक बाजार काफी तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसका फायदा उठाने वाले ज्यादातर स्टार्टअप और निवेश अमेरिका तथा यूरोप तक ही सीमित रहे हैं. जबकि असली मांग तो अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया जैसे उभरते बाजारों में है. इन बाजारों में स्टेबलकॉइन लोगों के लिए एक वित्तीय साधन बन गया है, जो उन्हें मुद्रास्फीति, राजनीतिक अस्थिरता और बैंकिंग सेवाओं की कमी जैसी समस्याओं से निपटने में मदद करता है.

निवेशकों और स्टार्टअप्स को चाहिए कि वे अपनी रणनीति में बदलाव लाएं और उभरते बाजारों में निवेश करने पर ज्यादा ध्यान दें. इसके साथ ही, नीति निर्माताओं और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भी इन बाजारों में स्टेबलकॉइन के विकास को समर्थन देने के लिए स्पष्ट और अनुकूल नियम बनाने चाहिए. तभी स्टेबलकॉइन का पूरा लाभ दुनिया भर के लोगों तक पहुंच सकेगा.

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