सीनियर AI पॉलिसी एडवाइजर के तौर पर श्रीराम कृष्णन का व्हाइट हाउस से जाना — अमेरिकी AI रणनीति पर क्या पड़ेगा असर?
द्वारा Mag-Info Tech editorial · 2026-06-07

अमेरिकी AI नीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाने वाले श्रीराम कृष्णन ने व्हाइट हाउस में अपने पद से हटने का ऐलान कर दिया है। कृष्णन, जो पिछले डेढ़ साल से अधिक समय से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पर सीनियर पॉलिसी एडवाइजर के तौर पर काम कर रहे थे, जून 2026 के अंत तक अपना कार्यकाल पूरा करेंगे। यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका और चीन के बीच AI में वैश्विक बादशाहत की होड़ तेज हो रही है और अमेरिकी सरकार के भीतर ही AI नियमन को लेकर बहस छिड़ी हुई है। ऐसे में कृष्णन का जाना न केवल एक व्यक्तिगत फैसला है, बल्कि इसके गहरे नीतिगत मायने भी हैं जो भविष्य में AI से जुड़े हर बड़े फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।
कृष्णन कौन हैं और उन्हें व्हाइट हाउस कैसे पहुँचे
श्रीराम कृष्णन कोई साधारण सरकारी अधिकारी नहीं हैं। उनका करियर टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के कई दिग्गज प्लेटफॉर्म्स से जुड़ा हुआ है। उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट, ट्विटर (अब X), याहू, फेसबुक (अब मेटा) और स्नैप जैसी कंपनियों में प्रोडक्ट टीम्स लीड की हैं। व्हाइट हाउस में आने से पहले वे एंड्रीसेन होरोविट्ज (a16z) में पार्टनर थे, जो अमेरिका की सबसे प्रभावशाली वेंचर कैपिटल फर्म्स में से एक है। यह फर्म खुद राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय रही है, और इसके संस्थापकों ने 2024 के चुनाव में ट्रंप प्रशासन को खुला समर्थन दिया था।
इसी तकनीकी और राजनीतिक पृष्ठभूमि के चलते कृष्णन को दूसरे ट्रंप प्रशासन में AI नीति के प्रमुख सलाहकार के रूप में चुना गया। वे उन कई टेक इंडस्ट्री की हस्तियों में से एक थे जिन्होंने सरकारी पद संभाले — एक ऐसा चलन जो दर्शाता है कि टेक्नोलॉजी कंपनियों और सरकार के बीच की दीवार पूरी तरह से पारदर्शी हो चुकी है। ट्रंप प्रशासन ने जानबूझकर उन लोगों को नीति निर्माण के केंद्र में रखा जो खुद टेक इंडस्ट्री से आते हैं, ताकि AI को लेकर सरकार का रुख उद्योग-अनुकूल बना रहे। कृष्णन इस रणनीति का सबसे ठोस उदाहरण थे।
AI Action Plan — नियमन से ज्यादा बुनियादी ढांचे पर जोर
कृष्णन के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक था AI Action Plan का मसौदा तैयार करना। इस योजना की मूल भावना साफ थी — अमेरिका में AI के विकास के लिए डेटा सेंटर्स के निर्माण को सर्वोच्च प्राथमिकता दो और भारी-भरकम नियमन या सुरक्षा मानकों को पीछे धकेलो। यह दृष्टिकोण पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर में AI नीति पर हो रही बहस के बिल्कुल उलट था, जहां यूरोपीय संघ जैसी संस्थाएं सख्त AI नियमन पर जोर दे रही थीं।

कृष्णन के इस प्लान के पीछे का तर्क यह था कि अगर अमेरिका AI में पीछे रह गया तो इसकी कीमत राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक प्रतिस्पर्धा दोनों के रूप में चुकानी पड़ेगी। इसलिए, सबसे पहले इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाओ — बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करो, डेटा सेंटर खड़े करो, और फिर नियमन की बात करो। यह दृष्टिकोण उद्योग के हिसाब से बहुत व्यावहारिक था, लेकिन AI सुरक्षा से जुड़े शोधकर्ताओं और नीति विशेषज्ञों के बीच इसे लेकर गहरी चिंता भी रही।
कार्यकाल के दौरान हस्ताक्षरित कार्यकारी आदेश
AI Action Plan के अलावा, ट्रंप प्रशासन ने कृष्णन के कार्यकाल के दौरान AI से जुड़े कई कार्यकारी आदेश (executive orders) पर हस्ताक्षर किए। इनमें से एक प्रमुख आदेश राज्य-स्तरीय AI नियमन को चुनौती देने से जुड़ा था। अमेरिका में कैलिफोर्निया, कोलोराडो और न्यूयॉर्क जैसे कई राज्यों ने AI कंपनियों पर अपने नियम लागू करने शुरू किए थे, और ट्रंप प्रशासन ने इसे अमेरिकी AI उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता के लिए खतरा माना। इस आदेश का उद्देश्य केंद्र सरकार के हाथ में AI नीति की बागडोर रखना था।
दूसरा महत्वपूर्ण आदेश AI oversight यानी निगरानी से जुड़ा था, लेकिन यहां टेक इंडस्ट्री के दबाव का असर साफ दिखा। शुरुआत में इस आदेश का दायरा काफी व्यापक था, लेकिन उद्योग की ओर से कड़ी आपत्तियों के बाद इसे विलंबित किया गया और फिर काफी संकुचित कर दिया गया। यह घटना दर्शाती है कि टेक कंपनियों का प्रशासन पर कितना सीधा प्रभाव है। इसके अलावा, ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि सरकार बड़ी AI कंपनियों में इक्विटी स्टेक ले सकती है — एक ऐसा विचार जो सरकार और निजी क्षेत्र के बीच संबंधों की परिभाषा को ही बदल सकता है।








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डेविड सैक्स और टेक-पॉलिटिक्स का नेटवर्क
कृष्णन ने अपने बयान में खुलकर स्वीकार किया कि पिछले 18 महीनों में उन्होंने सबसे ज्यादा काम डेविड सैक्स के साथ किया। सैक्स, जो खुद एक वेंचर कैपिटलिस्ट और लोकप्रिय पॉडकास्टर हैं, पहले AI और क्रिप्टो के लिए व्हाइट हाउस के 'czar' के तौर पर तैनात थे। सैक्स ने इस साल की शुरुआत में उस पद से इस्तीफा दे दिया और अब वे राष्ट्रपति के विज्ञान और प्रौद्योगिकी सलाहकार परिषद के सह-अध्यक्ष हैं।
दोनों के बीच का संबंध सिर्फ पेशेवर नहीं, बल्कि वैचारिक भी था। दोनों ही AI में अमेरिकी नेतृत्व के पक्षधर हैं और दोनों का मानना है कि अत्यधिक नियमन AI क्रांति को रोक सकता है। सैक्स की वर्तमान भूमिका यह सुनिश्चित करती है कि कृष्णन के जाने के बाद भी उसी विचारधारा का प्रभाव व्हाइट हाउस में बना रहे। कृष्णन ने खुद सैक्स की वकालत को "अमेरिका को AI में जिताने" के लिए महत्वपूर्ण बताया है।
अगला कदम — बाहरी संस्थाओं का निर्माण
शायद सबसे दिलचस्प बात यह है कि कृष्णन सरकार छोड़ने के बाद भी AI नीति से दूर नहीं होंगे। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे "संस्थाएं बनाएंगे" जो अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के लिए बड़ी चुनौतियों से निपटेंगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वे एक बाहरी संस्था शुरू कर रहे हैं जो ट्रंप की AI नीति को प्रभावित करने में उन्हें भूमिका देगी। यह मॉडल काफी नया है — सरकार में रहकर नीति बनाओ और फिर सरकार के बाहर से उसी नीति को आकार देते रहो।

कृष्णन ने खुद कहा है कि ऊर्जा, डेटा सेंटर्स और आम अमेरिकियों के लिए AI के लाभ तक पहुँच जैसे कई कठिन मुद्दे हैं जिन पर मिलकर काम करने की जरूरत है। यह संकेत देता है कि उनकी आगे की भूमिका सरकार और उद्योग के बीच एक कड़ी के रूप में हो सकती है — ऐसा व्यक्ति जो सत्ता के गलियारों को जानता है लेकिन अब निजी क्षेत्र की गति और लचीलेपन के साथ काम कर सकता है। यह पैटर्न अमेरिकी टेक पॉलिटिक्स में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
AI नीति का भविष्य — ऊर्जा और बुनियादी ढांचे की चुनौती
कृष्णन के जाने के बाद AI नीति के सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है। सबसे पहली चुनौती ऊर्जा है। AI मॉडल्स को ट्रेन करने और चलाने के लिए जितनी बिजली चाहिए, वह तेजी से बढ़ रही है। डेटा सेंटर्स अब न केवल टेक कंपनियों के लिए, बल्कि सरकारों के लिए भी राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन चुके हैं। अमेरिका के पास इतनी ऊर्जा उत्पादन क्षमता है कि वह इस मांग को पूरा कर सके, लेकिन इसके लिए नीतिगत समर्थन, निवेश और तेज निर्णय लेने की जरूरत है।
दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि AI के फायदे आम नागरिक तक कैसे पहुँचें। अभी तक AI का अधिकांश लाभ बड़ी टेक कंपनियों, स्टार्टअप्स और वॉल स्ट्रीट तक सीमित रहा है। अग
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